Monday, July 11, 2011

इन दुकानदारों से तो ठेके वाले भले


राजगुरु मार्केट से सटे आर्य बाजार में एक बुजुर्ग व उसका बेटा बहुत सालों से सडक़ किनारे चप्पलें बेच रहे हैं. सडक़ किनारे 4 फुट का खोखा बना है, जिसमें वह सामान रखते हैं. मुद्दा यह नहीं की यह खोखा वैध है या अवैध. मगर, ऐसा क्यों हो रहा है की इस खोखे को छोडक़र चप्पलें सडक़ पर रखी जाती हैं. सडक़ पर फुट दो फुट नहीं अपितु चप्पलें बेचने के लिए 10 फुट तक अवैध कब्जा किया हुआ है. इतना कब्जा करने के बाद भी न तो इन बुजुर्ग को शर्म आती है और न ही नगर निगम के अधिकारियों को. निगम की तरफ से दो-तीन महीने में दिखावे के लिए एक-दो बार अतिक्रमण हटाओ अभियान चला दिया जाता है. निगम कर्मचारियों के रहने तक तो दुकानदार सडक़ों पर रखे गए सामान को हटा लेते हैं, लेकिन उनके जाते ही सामान फिर सडक़ों पर अवैध कब्जा कर लेता है. बाजारों में अतिक्रमण को लेकर लोग गुफ्तगू करते हैं कि इन दुकानदारों से तो शराब के ठेके वाले भले हैं. किसी भी शराब के ठेके का कोई सामान शर्टर से बाहर नहीं होता है. तो क्या उनके यहाँ ग्राहक नहीं आते या फिर उनके पास काम की कमी है.


Thursday, June 30, 2011

चलती में तो सभी चलाते है


चलती में तो सभी चलाते है, जबकि शासन-प्रशासन आम आदमी की भलाई के लिए निजी तौर पर कोई काम करे तो माने. ऐसी ही कुछ गुफ्तगू हो रही है आज कल हिसार के पुरानी मंडी रोड के व्यापारियों और निवासियों में. आलम यह है की शासन-प्रशासन की नींद आज बिना धरना-प्रदर्शन के खुलती ही नहीं और जब यह सब करने के पश्चात नींद खुल भी जाये तो काम के बीच में ही कुछ ऐसे आदमी अपना काम निकलवा जाते है जिनकी शासन-प्रशासन में चलती है. जबकि उसी काम के पूरा होने के लिए आम आदमी बाट जोहता रह जाता है. हद तो उस समय हो जाती है जब चलती में करवाए गए उस काम पर खर्च का निर्वहन भी प्रशासन को ही करना पड़ता है.
ऐसा ही एक वाक्या बीते दिनों मंडी रोड पर देखने को मिला. पिछले पांच साल से सड़क बनने का इंतजार आखिरकार तब ख़त्म हुआ जब व्यापारियों ने रोड जाम कर सड़क बनाने की कार्यवाही को अंजाम तक पहुँचाने की मांग रखी. उनकी मेहनत रंग लाई और एक निश्चित अवधि के बाद सड़क निर्माण शुरू हुआ. लेकिन इस बीच वो सब कुछ हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. अपनी चलती में सब ने चलाई और सड़क बनने का कार्य लेट पर लेट होता रहा. किसी ने सीवरेज का काम अपनी मनमर्जी मुताबिक करवाया तो किसी ने अपने निजी स्वार्थ के चलते उस समय सड़क खुदवा दी जब सड़क निर्माण अपने अंतिम चरण में था. चलो जी अब सड़क बन कर तैयार है.

बात यहीं पर ख़त्म नहीं हुई, बल्कि गुफ्तगू ने उस समय और जोर पकड़ लिया जब अपने को जिंदल घराने के नजदीकी कहने वाले एक व्यवसायी ने ना सिर्फ अनाधिकृत रूप से अपने घर के बाहर का फर्श तक बनवा लिया बल्कि वो भी सरकारी खर्चे पर. एक तरफ हिसार में मानसून अपनी दस्तक दे चूका है लेकिन आम व्यवसायी अपनी-अपनी दुकानों के बाहर फर्श बनवाने का इंतजार महज इसलिए कर रहा है की प्रशासन की तरफ से पांच फुट का फुटपाथ बनाया जाना है. प्रशासन इस बात को भूल कर की एक ही बरसात दुकानों को पानी से लबालब भर सकती है अब चलती वालों की चमची करने में जुटा है. अब पहलु यह है की आज चलती में तो सभी चलाते है लेकिन आम आदमी का काम कब और कैसे होगा.


Sunday, April 24, 2011

व्हीकल पर नाबालिग, नाबालिग की रफ़्तार


अक्सर ऐसा होता है की हम घर से अच्छे भले मूड से निकलते है लेकिन कोई न या कोई ऐसा नजारा देख लेते है या कोई ऐसा हादसा हो जाता है की लगता है की अब तो सारा दिन खराब ही जायेगा. मेरे साथ भी अक्सर ऐसा होता है. लगभग सुबह-सुबह सभी को जल्दी भी होती है. ऐसे में अगर हम कोई ऐसा नजारा देख भी लेते है तो कुछ नहीं कह-कर पाते लेकिन सारा दिन लगता है की आज मैंने जो देखा वो गलत हो रहा था या ऐसा नहीं होना चाहिए था.
अब देखो न सुबह हमको जितनी जल्दी होती है उससे कहीं ज्यादा जल्दी बच्चो को होती है. कभी सुबह जल्दी होती है स्कुल पहुँचने की तो कभी शाम को जल्दी होती है ट्यूशन जाने की. ऐसे में बच्चो के माता-पिता कभी-कभी उनके हाथ में व्हीकल भी थमा देते है, या जल्दी पहुँचने के चक्कर में बच्चे व्हीकल ले जाने की जिद पकड़ लेते है. उस समय कोई यह नहीं सोचता की बच्चा जल्दी पहुँचने की एवज में उसको कितनी रफ़्तार से चलाएगा या उसका स्कुल या ट्यूशन कोई ऐसी जगह तो नहीं है जहाँ से भारी वहां गुजरते है. और अगर ऐसे में बालक के साथ उसका कोई दोस्त बैठा है तो सोने पे सुहागा वाली बात साबित होती है. अक्सर इतनी कम उम्र के बच्चो को व्हीकल चलाते देखा जा सकता है और उसी समय अनायास ही हमारे मुहं से निकल जाता है की यह गलत बात है. जबकि कोई यह नहीं सोचता की जब देश का कानून उस बालक को व्हीकल चलने की इजाजत नहीं देता तो माता-पिता क्यों इतना बड़ा खतरा मोल लेते है.


Sunday, April 10, 2011

मौका भी, दस्तूर भी लेकिन....


अक्सर ऐसा होता है की हम सारे दिन में बहुत कुछ देखते है, सुनते है और इन सबके बाद बहुत कुछ महसूस भी करते है. लेकिन दिल में यह मलाल रह जाता है की हम मौके पर यह सोच कर चुप रह गए की यह सब हमारे साथ नहीं हो रहा. या जो भी गलत हो रहा है हम उसका हिस्सा नहीं है. मौका ख़ुशी का हो या गम का लेकिन बाद में सोचने के बाद यह लगता है की भले ही यह सब करने का मौका भी था या दस्तूर भी लेकिन जो कुछ हो रहा था वो सब गलत हो रहा था. हम में से हर कोई सप्ताह में कम से कम एक दिन कहीं ना कहीं किसी ना किसी को सार्वजानिक स्थान पर शराब का सेवन करते अवश्य देखता होगा. लेकिन हम यह सोच चुप रह जाते है की पीने दो हमारा क्या बिगड़ रहा है. लेकिन बाद में या तो इस बात का हम किसी के आगे जिक्र करते है या सोचते है की यह गलत हो रहा था. गुफ्तगू ने यह प्रयास किया है ऐसी ही कुछ गलत बातो को आपके समक्ष रखा जाये.



अब देखो ना भारत ने क्रिकेट वर्ल्ड कप के फाइनल में श्री लंका को हरा कर इतिहास रच दिया. जैसे ही भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने विजयी छक्का लगाया देश के लगभग हर शहर में लोग सडको पर निकल आये. सभी ने खूब मस्ती की, हो-हल्ला किया. इस दौरान आतिशबाजी भी हुई तो रंग-गुलाल भी उड़ाया गया. यह सब देख ख़ुशी हो रही थी की इस जीत से लोग कितने उत्साहित और खुश है. मौके पर बहुत से लोग ऐसे भी थे जो शराब पिए हुए थे तो बहुत से ऐसे थे जो शराब की दूकान से खरीद भी रहे थे. एक समय वो था जब जिस चौक पर मजमा जमा हुआ था उस चौक पर स्थित शराब की दूकान पर उस रात लाइन लगी हुई थी.
जैसे-जैसे चौक पर भीड़ जमा होती चली गई वैसे-वैसे व्यवस्था भी बिगडती चली गई. मौके की नजाकत को देखते हुए पुलिस ने किसी को कुछ नहीं कहा और सब कुछ सामान्य रूप से चलता रहा. इतने में ही शराब के खरीददार कुछ लोग तो अपने-अपने घर चले गए लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो मौके पर ही पीने लगे. सार्वजानिक स्थान पर शराब पीने वालो की संख्या में इजाफा ही हो रहा था और मजे की बात यह थी की पुलिस कानून के नाम पर चुपचाप खड़ी सब कुछ देख रही थी. पुलिस भी वही जो प्रतिदिन एक या दो मामले ऐसे दर्ज करती है की पुलिस ने इतने आदमियों को सार्वजानिक स्थान पर शराब पीने के जुर्म में गिरफ्तार किया है.
उस रात एक समय ऐसा आया जब शराब पी कम जा रही थी और उछाली ज्यादा जा रही थी. कुल मिला कर जहाँ नजर जा रही थी वहां पुलिस की आँखों के आगे सार्वजानिक स्थान पर शराब ही शराब नजर आ रही थी. ऐसे में जिस पर शराब गिर रही थी या जो दूर खड़ा होकर तमाशा देख रहा था उसको जरुर बुरा लग रहा था की भले ही जो कुछ हो रहा है उसको करने का मौका भी था और दस्तूर भी, लेकिन शराब को लेकर जो कुछ हो रहा है वो सब गलत हो रहा है.


Thursday, March 31, 2011

यह गलत बात है


ख़ुशी तो हमको एक खास मौके पर ही  मिलती लेकिन कहते है की परेशानी कभी भी और कहीं भी हमारी जिंदगी में दस्तक  दे सकती है. अब देखो न सुबह घर से निकलने से लेकर रात होने तक हम बहुत से  ऐसे नज़ारे देखते है जो हमारे साथ-साथ अन्यो को भी परेशानी में डाल देते है.  इसके साथ ही आम होने वाली घटना कभी-कभी हमारे दिलो-दिमाग पर इतना असर छोड़  जाती है की हम ना तो कुछ कर पाते है और ना ही किसी को कुछ कह पाते है,  लेकिन बाद में किसी न किसी से जिक्र जरुर करते है. अब क्या कहूँ की किसी  बात का जिक्र होगा तो गुफ्तगू भी होगी. 
ऐसी  ही आम होने वाली घटनाओं, परेशानियों और गुफ्तगू को आप तक पहुँचाने के लिए  मैंने यह कालम शुरू किया है. इस कालम में शहर, प्रदेश व् देश में होने वाली  उन घटनाओं पर गुफ्तगू की जायेगी जिसे देखते ही हमको लगता है की यह गलत बात  है. कहते है की इंसान गलती का पुतला है लेकिन अगर यह कालम उन गलतियों को  सुधारने में ना सही लेकिन उनको समझाने तक में कामयाब हुआ तो मै समझूंगा की  इस कालम में गुफ्तगू करना कारगर साबित हुआ. इस कालम को नाम दिया गया है "  यह गलत बात है ". सबसे पहले हम बात करते है अनाधिकृत रूप से चलने वाली  जीपों की.

आज हर शहर में निजी जीप वालो का अपना अलग ही आतंक छाया हुआ है. आम  आदमी तो इसमें सफ़र करना तो दूर इसके नजदीक भी जाना पसंद नहीं करता. फिर भी  इनकी पौ-बाराह मात्र इसीलिए है की यह अन्य साधनों से ज्यादा तेजी से चलती  है और सवारी को उसके गंतव्य तक बहुत जल्दी पहुंचा देती है. बस यही जनता के  लिए परेशानी का सबब है. इतना ही नहीं किसी-किसी नगर में तो इनकी संख्या  इतनी ज्यादा है की चौपहिया वाहन तो क्या दूपहिया वाहन को चलने तक की जगह  नहीं मिलती. यह हर चौक पर आपको जाम लगाये मिलेगी.
जनता की परेशानी  सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. इसके अतिरिक्त अपनी रफ़्तार पर आने के बाद यह  इतनी आड़ी-तिरछी चलती है की इसके नजदीक से गुजरने वाले की साँसे तब तक अटकी  रहती है जब तक वो इसको पार न कर दे. साथ ही साथ इसमें बैठने वालो की  संख्या इतनी अधिक होती है की जीप में भी जहाँ 12 से 15 सवारी होती है वहीँ 5   से 7 सवारी बाहर लटकी  होती है. सवारियों के लिए दुआ की जा सकती है की  कोई दुर्घटना का शिकार न हो जाये. सरकार या प्रशासन भी इन पर रोक लगाने में  अभी तक नाकामयाब हुए है. यहीं कारण है की इनको देखने के बाद यहीं विचार  आता है यह गलत बात है.


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