Thursday, January 05, 2012

पुलिस पुलिस की तरह रहती तो...


मुझे याद है वो समय जब हिसार में एकाएक चैन स्नेचिंग के मामले बढ़ने लगे थे. भरी दोपहर भी महिलाओं का घर से निकलना तक दूभर हो गया था. उधर कभी गोलीकांड तो कभी ह्त्या, हत्या प्रयास तो कभी फिरौती मांगे जाने से बदमाशों ने पुलिस की नाक में दम किया था. अब जब कुछ ही माह में दहशत इस कदर बढ़ गई तो पुलिस भी बेचारी क्या कर सकती थी. आनन्-फानन में उसके पास एक ही रास्ता बचता है की पुलिस की गश्त बढ़ाई जाये. कुछ ऐसा ही करते हुए आदेश जारी किये गए की ह़र मोटरसाइकिल सवार की जांच की जाए. इसके लिए कभी चौकी बढाने पर जोर दिया गया तो कभी नाके. रात्रि गश्त के साथ-साथ दोपहर को भी अक्सर गायब रहने वाले पुलिसकर्मी हर चौक पर नजर आने लगे.
कुछ माह पूर्व ऐसी ही एक रात की बात है की रात को 11 बजे थे. मैं एक शादी समारोह से घर की और लौट रहा था की दो पुलिसकर्मियों ने मुझे रोक लिया. मैंने बड़े सदभाव से अपना लाइसेंस उन्हें दिखाया और अपना परिचय देते हुए कहा की श्रीमान मैं एक पत्रकार हूँ. मेरे पारिवारिक सदस्य घर पहुँच चुके है मुझे भी जाने दे तो उनका कहना था की यह लाइसेंस और परिचय पत्र तो आपकी पहचान है लेकिन यह मोटरसाइकिल आपका है इसकी पुष्टि कैसे होगी. मैंने जवाब देते हुए कहा की यह मोटरसाइकिल तो चलो मेरे नाम से है लेकिन अगर यह किसी परिचित का होता तो मैं आपकी पुष्टि कैसे करवाता. मैंने उनसे जब यह पूछा की आज तक कितने अपराधी पत्रकार पाए गए है तो वो शून्य हो गए.
दुःख इस बात का नहीं था की उन्होंने मुझे रोका और मेरे कागजात की जांच की. लेकिन गुफ्तगू का विषय यह था की साल 2011 में पूरे वर्ष जब हिसार में अपराधी अपनी बादशाहत बनाये रखने में कामयाब हुए उस समय पुलिस कहाँ थी. और तो और इस तरह की गश्त से पुलिसकर्मी आम आदमी को तो परेशान कर पाने में पूरी तरह कामयाब हुए लेकिन ऐसी किसी भी गश्त से आज तक कोई अपराधी पकड़ने में सफलता हासिल क्यों नहीं हुई. जितनी सजगता से उन्होंने मुझे रोका और पूछताछ की अगर उतनी लगन से वो सभी को रोकते तो आज कई अपराधी और चैन स्नेचर सलाखों के पीछे होते. इस बात का एक पहलू यह समझ में आता है की जहाँ ऐसी गश्त के दौरान आम आदमी को रोक कर तो पुलिसकर्मी सवालों की बौछार कर देते है वहीँ बदमाश किस्म व् हट्टे-कट्टे लोगों से सवाल पूछ पाना तो दूर की बात है उनको रोकना ही आम पुलिसकर्मी के बस की बात नहीं है.
किसी भी तरह की कोई बड़ी वारदात होने के पश्चात पुलिस एक बार तो सक्रिय होती है लेकिन कुछ ही दिनों बाद वो अपने पुराने ढर्रे पर लौट आती है. इसका नतीजा यह होता है की गश्त के दौरान पुलिस चालान काटने में तो मशगुल नजर आती है लेकिन वो उस समय यह भूल जाती है की यह सक्रियता सिर्फ चालान काटने के लिए नहीं अपितु अपराधियों की धड्पकड़ के लिए भी ज्यादा जरुरी है. लेकिन अगर पुलिस पुलिस की तरह रहती तो साल 2011 में अपराधियों के इतने हौंसले नहीं बढ़ते की पुलिस की सक्रियता के बाद भी बाइकर्स बेखौफ आये दिन चैन स्नेचिंग की वारदात हो अंजाम दे पाने में सफल होते. इस पर भी मजेदार बात यह रही की आज तक गश्त के दौरान कोई अपराधी पकड़ में आना तो दूर एक भी चैन स्नेचर पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा, जबकि चैन स्नेचिंग के मामलों में पूरे वर्ष दिन-प्रतिदिन इजाफा जरुर होता रहा.

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